Friday, November 15, 2013

ई कैसी बैठक हो रही भाई 

अड़ीबाजी कभी बनारस के अस्सी और वहाँ के कई ऐसे खलिहर लोगों की काशिका कही गयी मज़ेदार कहानियां हुआ करती हैं जिन्हें वहाँ कि मस्ती में चाय कि चुस्कियों के साथ सुनने में मज़ा आये और हटने का दिल ना  कहे … पर इन दिनों खबरिया टीवी चैनलों में आपको हमें बड़े खलिहर मिल ही जाते हैं बैठक करते हुये… मैं जब  उन लोगों को सुनता हूं तो रुककर देख लेता हूं कि ई कैसी बैठक हो रही है भाई … जहाँ कुछ खाली पत्रकार और खाली टाइप के राजनीतिक चेला टाइप के लोग मिल जाते हैं. जिनके वाक्य माशा अल्ला बड़े गजब के होते हैं. लेकिन असलियत ये कि वहाँ बातें तो हमारी आपकी होती हैं लेकिन उन बातों का असर होता कही दिखता नहीं फिलहाल अभी कही निकलना है लौटकर कुछ जरुर  निपटेंगे .... 

शुरुआत ....... 

अड़ी से,,,, शुरू करने का मतलब ये नहीं कि मई भी लोकसभा चुनाव के लिए कोई तैयारी कर रहा हूं ,,, फिलहाल करता भी तो कुछ हासिल नहीं होने वाला ये तो पहले से ही मान बैठा हूँ.  सो बस लिखने का कीड़ा रेंगा तो बैठ गए और अपनी पत्रकारिता कि अभी तक असफल कहानी को एक स्वान्तह सुखाय का एक नया आयाम देने के लिए. काशी में कुछ दिनों तक मुख्य धारा कि पत्रकारिता करने के बाद अड़ी और अड़ीबाजों की एक नयी (मेरे लिए ) प्रजाति से रूबरू हुआ. उसके बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में आजमगढ़ में काफी अड़ी वाले लेख लिखे। 
मज़ा आया लिखने में,,, लेकिन उसके बाद कुछ कारणों से पत्रकारिता से संपर्क टूट ही गया,,, मज़ा नहीं आया अपनी ये कहानी बताने में पर आगे से जो अदि का अंदाज़ होगा वो मिलेगा इस ब्लॉग ये मेरा अभी तो खुद से वादा है। इसके पीछे भी एक लॉजिक है कि अभी मुझे कोई जानने वाला नहीं,,, खैर कैसा होगा लेखन का तरीका,,, ये भी बता दूं ,,, मज़ा आता कि काशी कि काशिका में ही होता पर कड़ी हिंदी में ही होगा पर तड़का लगाने कि कोशिश होगी,,,, सो यही पर प्रस्तावना ख़त्म करते हैं और शुरू करते हैं अड़ी से.… का हल्का फुल्का न ही नया और न ही बहुत पुराना …टोटली कुछ भी नहीं पर बहुत कुछ होगा …… अरे कन्फ्यूज न होइए भाई .... अरे कदी कदी आ जायेंगे तो समझ जायेंगे ……